Saturday, April 11, 2015

{ ८९२ } {March 2015}




अपरिमित रूप का सागर तुम ही हो
सुधा की नव्यतम गागर तुम ही हो
तुम्ही मधुमास की मादक मधुर मधु
प्रणय के प्राण का आगर तुम ही हो।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल


आगर = खजाना


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